लखनऊ में विजिलेंस का बड़ा धमाका: शॉपिंग मॉल में घूम रहा था NRHM घोटाले का मास्टरमाइंड पूर्व विधायक, सतर्कता टीम ने घेराबंदी कर दबोचा, भेजा गया जेल

लखनऊ: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से इस वक्त की सबसे बड़ी आपराधिक और राजनीतिक खबर सामने आ रही है। अरबों रुपये के बहुचर्चित राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (NRHM) घोटाले के मुख्य आरोपी और बहराइच की पयागपुर सीट से पूर्व कांग्रेस विधायक मुकेश श्रीवास्तव उर्फ ज्ञानेंद्र प्रताप श्रीवास्तव को सतर्कता अधिष्ठान (विजिलेंस) की सीआई सेक्टर टीम ने बुधवार को गिरफ्तार कर लिया है। विजिलेंस की टीम ने इस हाई-प्रोफाइल आरोपी को लखनऊ के पॉश इलाके गोमती नगर स्थित वेव मॉल (Wave Mall) से उस समय हिरासत में लिया, जब वह वहां बेफिक्र होकर घूम रहा था। इस अचानक हुई छापेमारी से मॉल परिसर में हड़कंप मच गया। गिरफ्तारी के बाद टीम उन्हें कड़ी सुरक्षा के बीच डाक्टरी परीक्षण के लिए हजरतगंज के सिविल अस्पताल ले गई, जहां से जरूरी कागजी कार्रवाई पूरी करने के बाद कोर्ट के आदेश पर उन्हें सीधे जेल भेज दिया गया है।

विजिलेंस से मिली जानकारी के मुताबिक, पूर्व विधायक की यह सनसनीखेज गिरफ्तारी आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने, सरकारी धन के गबन और भारी वित्तीय अनियमितताओं के मामले में की गई है। मुकेश श्रीवास्तव के खिलाफ वर्ष 2021 में देवीपाटन मंडल के बलरामपुर जिले में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार और आय से अधिक संपत्ति बनाने की गंभीर शिकायतें मिली थीं, जिसके बाद उनके खिलाफ लंबी जांच चली और मुकदमा दर्ज किया गया था। इस गिरफ्तारी के बाद उत्तर प्रदेश के सियासी गलियारों के साथ-साथ स्वास्थ्य विभाग में भी हड़कंप मच गया है, क्योंकि इस घोटाले की आंच कई रसूखदार अधिकारियों तक पहुंचनी तय मानी जा रही है।

सतर्कता टीम ने घेराबंदी कर दबोचा

विधायक रहते हुए बटोरा अकूत धन, वैध स्रोतों से कई गुना ज्यादा निकली पूर्व माननीय की संपत्ति

सतर्कता अधिष्ठान (विजिलेंस) की लखनऊ सेक्टर टीम ने मुकेश श्रीवास्तव के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) की संगीन धाराओं के तहत शिकंजा कसा है। विजिलेंस की विस्तृत जांच रिपोर्ट में यह बेहद चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि पूर्व विधायक ने अपने पूरे कार्यकाल (6 मार्च 2012 से 11 मार्च 2017) के दौरान सत्ता और पद का जमकर दुरुपयोग किया। इस 5 साल के समय में उन्होंने अपने सभी ज्ञात और वैध आय के स्रोतों की तुलना में करोड़ों रुपये की अधिक बेनामी संपत्ति खड़ी कर ली।

विजिलेंस के अधिकारियों के मुताबिक, मुकेश श्रीवास्तव को अपनी आय और संपत्तियों के बीच के इस भारी अंतर का हिसाब देने के लिए कई मौके दिए गए थे, लेकिन वह अपनी वैध कमाई का कोई भी पुख्ता सबूत या दस्तावेज पेश नहीं कर पाए। इसके बाद ही जांच टीम ने उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई को आगे बढ़ाते हुए गिरफ्तारी का पूरा खाका तैयार किया। पूर्व विधायक पर आरोप है कि उन्होंने जनता के स्वास्थ्य के लिए आने वाले बजट को अपनी तिजोरियां भरने में इस्तेमाल किया और लखनऊ से लेकर बहराइच तक कई कीमती संपत्तियां अपने और अपने करीबियों के नाम पर दर्ज करा लीं।

विजिलेंस टीम पूर्व विधायक मुकेश श्रीवास्तव को मेडिकल जांच के लिए सिविल अस्पताल ले गई।

10 दिन पहले दर्ज हुई थी नई एफआईआर, सीबीआई भी पहले भेज चुकी है जेल

मुकेश श्रीवास्तव की मुश्किलें केवल इसी एक मामले से नहीं जुड़ी हैं। विजिलेंस ने महज 10 दिन पहले ही बलरामपुर जिले के सरकारी अस्पतालों में दवाइयों और चिकित्सा उपकरणों की खरीद में हुए एक और बड़े वित्तीय घोटाले को लेकर उनके खिलाफ एक नई एफआईआर (FIR) दर्ज की थी। जांच एजेंसियों के रिकॉर्ड के मुताबिक, मुकेश श्रीवास्तव का विवादों और घोटालों से बहुत पुराना नाता रहा है। इससे पहले जब पूरे उत्तर प्रदेश में एनआरएचएम (NRHM) घोटाला उजागर हुआ था, तब देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी सीबीआई (CBI) ने भी उन्हें मुख्य आरोपी बनाते हुए गिरफ्तार किया था और वह लंबे समय तक जेल में बंद रहे थे।

हाल ही में वह सीबीआई कोर्ट से जमानत पर बाहर आए थे, लेकिन बाहर आते ही विजिलेंस की जांच की आंच उन तक पहुंच गई। विजिलेंस की ताजा तफ्तीश में यह पुख्ता सबूत मिले हैं कि वर्ष 2014 से 2019 के बीच मुकेश श्रीवास्तव ने राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत मिलने वाले सरकारी ठेकों में भारी हेराफेरी की थी। उन्होंने कागजों पर या तो बिल्कुल काम नहीं कराया या फिर नाममात्र का आंशिक काम कराकर विभागीय अधिकारियों की मिलीभगत से पूरे बजट का शत-प्रतिशत भुगतान उठा लिया। इस मामले में तत्कालीन सीएमओ (CMO) सहित स्वास्थ्य विभाग के कई बड़े मगरमच्छों को भी सह-आरोपी बनाया गया है।

गिरफ्तारी के दौरान मुकेश श्रीवास्तव ने मीडियो से कहा- जनता मेरे साथ खड़ी है, 2027 में जवाब देगी।

2021 में शासन ने दिए थे खुली जांच के आदेश, पूर्व सीएमओ सहित 8 दिग्गजों पर दर्ज हुआ नामजद मुकदमा

बलरामपुर जिले के स्वास्थ्य महकमे में मचे इस अंधेरगर्दी और करोड़ों रुपये के बजट की बंदरबांट की शिकायतें जब शासन तक पहुंचीं, तो वर्ष 2021 में उत्तर प्रदेश सरकार ने इस पूरे मामले की विजिलेंस जांच कराने के सख्त आदेश दिए थे। विजिलेंस की सीआई सेक्टर टीम ने जब फाइलों को खंगालना शुरू किया, तो परतों के नीचे छिपे भ्रष्टाचार के कई गंभीर मामले सामने आए। जांच टीम ने जब अपनी अंतरिम रिपोर्ट शासन को सौंपी, तो वहां से हरी झंडी मिलते ही बलरामपुर में एक बड़ा सामूहिक मुकदमा दर्ज कराया गया।

विजिलेंस द्वारा दर्ज की गई इस नामजद एफआईआर में पूर्व कांग्रेस विधायक मुकेश श्रीवास्तव के अलावा स्वास्थ्य विभाग के कई आला अधिकारियों को लपेटे में लिया गया है। इस सूची में तत्कालीन मुख्य चिकित्साधिकारी (CMO) डॉ. घनश्याम सिंह, डॉ. सत्यदेव, चिकित्सा अधीक्षक डॉ. प्रवीन कुमार, वरिष्ठ सहायक अजय कुमार श्रीवास्तव, अवर अभियंता (JE) राम मनोरथ मौर्य, कनिष्ठ सहायक पूनम सिंह और ‘आरपी ग्रुप ऑफ कंस्ट्रक्शन’ के प्रोपराइटर राजेंद्र प्रसाद श्रीवास्तव को मुख्य रूप से नामजद किया गया है। इन सभी पर सरकारी पद का दुरुपयोग कर राजकोष को चूना लगाने का संगीन आरोप है।

एक गाड़ी के बदले निकाल लिया तीन गाड़ियों का पैसा, दवा के वाउचर पास करने के लिए चलती थी 25% की घूस

विजिलेंस की प्रारंभिक जांच में भ्रष्टाचार और जालसाजी के ऐसे-ऐसे अनोखे तरीके सामने आए हैं जिन्हें सुनकर कोई भी हैरान रह जाए। एफआईआर के मुताबिक, स्वास्थ्य विभाग की ‘आरवीएसके’ और ‘सपोर्टिंग सुपरविजन योजना’ के तहत फील्ड में डॉक्टरों और अधिकारियों की चेकिंग के लिए गाड़ियां किराए पर ली जानी थीं। लेकिन इस सिंडिकेट ने कमाल की जालसाजी करते हुए जमीन पर केवल एक गाड़ी का संचालन किया और कागजों पर हेराफेरी करके सरकारी खजाने से तीन-तीन वाहनों के किराए की पूरी धनराशि हड़प ली। इस पूरे खेल में तत्कालीन सीएमओ डॉ. घनश्याम सिंह की सीधी संलिप्तता के साक्ष्य मिले हैं।

इसके अलावा, वित्तीय नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए छपाई (प्रिंटिंग) और अन्य रखरखाव के बड़े-बड़े काम बिना किसी टेंडर (निविदा) प्रक्रिया के ही चहेते ठेकेदारों को दे दिए गए। टेंडर होने के बावजूद सीएमओ ने जानबूझकर एमओआईसी (MOIC) को मनमानी छूट दी ताकि बजट को ठिकाने लगाया जा सके। सबसे शर्मनाक खुलासा यह हुआ है कि अस्पतालों में मरीजों की चिकित्सा प्रतिपूर्ति (मेडिकल रीइंबर्समेंट) के वाउचरों को पास करने के बदले पीड़ित कर्मचारियों और वेंडरों से 10 से लेकर 25 फीसदी तक की खुली रिश्वत वसूली जाती थी। बिना किसी स्टॉक रजिस्टर या आवश्यक कागजात तैयार किए ही लाखों के भुगतान आंखें बंद करके पास कर दिए गए, जिससे सरकारी खजाने को भारी चपत लगी।

रिटायरमेंट के बाद भी नहीं बच पाए भ्रष्ट अधिकारी, वर्ष 2017 से 2022 के बीच हुआ था सबसे बड़ा खेल

विजिलेंस की इस कार्रवाई ने यह साफ कर दिया है कि भ्रष्टाचार के मामलों में रिटायरमेंट के बाद भी कानून के हाथ गुनहगारों तक पहुंच ही जाते हैं। इस मामले में आरोपी बनाए गए तत्कालीन सीएमओ डॉ. घनश्याम सिंह, डॉ. सत्यदेव, डॉ. प्रवीन कुमार और अवर अभियंता राम मनोरथ मौर्य अपनी सरकारी सेवा पूरी कर सेवानिवृत्त (रिटायर) हो चुके हैं और आराम की जिंदगी जी रहे थे। लेकिन विजिलेंस ने उनके खिलाफ कोर्ट से वारंट लेकर कानूनी कार्रवाई को तेज कर दिया है, जिससे इन पूर्व अधिकारियों की भी मुश्किलें बेहद बढ़ गई हैं।

जांच डायरी के अनुसार, बलरामपुर जिले के सरकारी अस्पतालों में सबसे बड़ा घोटाला वित्तीय वर्ष 2017-18 से लेकर 2021-22 के दौरान किया गया था। इस अवधि में ‘आरपी ग्रुप ऑफ कंस्ट्रक्शन’ के मालिक राजेंद्र प्रसाद श्रीवास्तव और पूर्व विधायक मुकेश श्रीवास्तव की फर्मों ने मिलकर आधे-अधूरे निर्माण और मरम्मत कार्य दिखाए और अफसरों के दस्तखत कराकर करोड़ों रुपये डकार लिए। विजिलेंस के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि मुकेश श्रीवास्तव की इस गिरफ्तारी के बाद अब अन्य नामजद आरोपियों पर भी शिकंजा कसा जाएगा और बहुत जल्द इस रैकेट से जुड़े कुछ और बड़े चेहरों को सलाखों के पीछे भेजा जाएगा।

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