इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: लंबित आपराधिक मामला हर स्थिति में सरकारी नौकरी से वंचित करने का आधार नहीं

इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

लखनऊ (राजधानी न्यूज): इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे युवाओं के पक्ष में एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट रुख अपनाते हुए कहा है कि किसी भी अभ्यर्थी के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों को हर स्थिति में सरकारी नौकरी से वंचित करने का आधार नहीं बनाया जा सकता। जस्टिस श्री प्रकाश सिंह की एकल पीठ ने साफ किया कि यदि अभ्यर्थी किसी मामले में ‘किशोर’ (नाबालिग) घोषित हो चुका हो या पुलिस जांच के बाद क्लोजर रिपोर्ट (अंतिम रिपोर्ट) लगा चुकी हो, तो केवल इन तकनीकी कारणों से उसकी नियुक्ति रोकना पूरी तरह अनुचित है।

क्या था पूरा मामला?

यह आदेश अंबेडकरनगर निवासी सुशील त्रिपाठी की याचिका पर सुनवाई करते हुए पारित किया गया। सुशील का चयन कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ESIC) में मल्टी टास्किंग स्टाफ (MTS) के पद पर हुआ था। लिखित परीक्षा पास करने, दस्तावेज सत्यापन (Document Verification) और नियुक्ति प्रस्ताव मिलने के बावजूद विभाग ने पुलिस वेरिफिकेशन की रिपोर्ट का हवाला देकर उनकी जॉइनिंग पर रोक लगा दी थी। पुलिस रिपोर्ट में सुशील के खिलाफ दो आपराधिक मामलों का उल्लेख था।

याची ने खुद दी थी जानकारी, नहीं छिपाया कोई तथ्य

अदालत में सुनवाई के दौरान याची के अधिवक्ता ने पक्ष रखते हुए बताया कि सुशील ने चरित्र सत्यापन प्रपत्र (Verification Form) भरते समय दोनों मुकदमों की जानकारी खुद दी थी और विभाग से कोई भी तथ्य नहीं छिपाया था। इन दोनों मामलों की स्थिति इस प्रकार थी:

  • पहला मामला (2015): यह एक नॉन-कॉग्निजेबल रिपोर्ट (NCR) थी, जिसमें सुनवाई के बाद किशोर न्याय बोर्ड (Juvenile Justice Board) ने घटना के समय सुशील को ‘किशोर’ (नाबालिग) घोषित कर दिया था।
  • दूसरा मामला (2020): इस मामले में पुलिस अपनी विस्तृत जांच पूरी कर अदालत में फाइनल रिपोर्ट (FR) दाखिल कर चुकी है। हालांकि, ट्रायल कोर्ट द्वारा इस फाइनल रिपोर्ट पर अभी अंतिम आदेश दिया जाना बाकी है।

किशोरावस्था की गलतियों से करियर को अनिश्चितकाल तक नहीं रोक सकते

न्यायमूर्ति श्री प्रकाश सिंह ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न नजीरों और फैसलों का हवाला देते हुए विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर टिप्पणियां कीं:

  • किशोर न्याय अधिनियम का मूल उद्देश्य: कोर्ट ने कहा कि किशोर न्याय अधिनियम (Juvenile Justice Act) की आत्मा यही सुनिश्चित करना है कि किशोरावस्था (नाबालिगी) में अनजाने में हुई किसी घटना या गलती का नकारात्मक असर किसी व्यक्ति के भविष्य, करियर और सामाजिक पुनर्वास पर न पड़े। अगर अपराध के समय अभ्यर्थी नाबालिग था, तो दोषसिद्धि (Conviction) होने पर भी उसे नौकरी से वंचित नहीं किया जा सकता।
  • पुलिस की फाइनल रिपोर्ट सर्वोपरि: कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि यदि पुलिस किसी मामले की तफ्तीश पूरी कर फाइनल रिपोर्ट दे चुकी है, तो केवल मजिस्ट्रेट कोर्ट द्वारा अंतिम आदेश न दिए जाने के कारण किसी युवा के करियर को अनिश्चितकाल के लिए अधर में नहीं लटकाया जा सकता।

विभाग के पास रहेगा भविष्य में एक्शन का अधिकार:  हाईकोर्ट ने फैसला सुनाते हुए यह भी स्पष्ट कर दिया कि यदि भविष्य में अदालत द्वारा पुलिस की फाइनल रिपोर्ट निरस्त कर दी जाती है और याची के खिलाफ दोष सिद्ध होता है, तो संबंधित विभाग के पास सेवा नियमावली के अनुसार उसके खिलाफ निलंबन या बर्खास्तगी की कार्रवाई करने का पूरा अधिकार सुरक्षित रहेगा।

ESIC कानपुर को 30 दिन का अल्टीमेटम

इन महत्वपूर्ण और कड़े कानूनी ऑब्जर्वेशन के साथ, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ESIC) के क्षेत्रीय निदेशक, कानपुर को सख्त निर्देश जारी किए हैं। कोर्ट ने आदेश दिया है कि विभाग याची सुशील त्रिपाठी के खिलाफ लंबित इन दोनों मामलों की अनदेखी करे और आदेश की प्रति मिलने के 30 दिनों के भीतर उसे आधिकारिक जॉइनिंग लेटर (नियुक्ति पत्र) जारी कर सेवा में बहाल करे।

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