उत्तर प्रदेश की चिकित्सा व्यवस्था के सबसे बड़े केंद्र किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी से इस वक्त की बेहद बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है। केजीएमयू के यूरोलॉजी विभाग में करोड़ो रुपये के दवा घोटाले और नेत्र रोग विभाग (Ophthalmology) में मरीजों को बाहर के निजी मेडिकल स्टोर से जबरन महंगे लेंस व दवाएं मंगवाने के संगीन मामले की उच्चस्तरीय जांच पूरी हो गई है। शासन की बेहद सख्त नाराजगी और लगातार बढ़ते दबाव के बाद केजीएमयू प्रशासन ने आनन-फानन में इस पूरे महाघोटाले की विस्तृत और अंतिम जांच रिपोर्ट उत्तर प्रदेश शासन को सौंप दी है।
शासन की ओर से इस पूरे भ्रष्टाचार तंत्र को बेनकाब करने के लिए 20 मुख्य बिंदु तय कर बिंदुवार जवाब मांगा गया था। केजीएमयू प्रशासन ने इन सभी 20 संवेदनशील बिंदुओं पर सिलसिलेवार स्पष्टीकरण देते हुए करीब तीन पेज की एक बेहद गोपनीय और कड़क रिपोर्ट तैयार कर भेजी है। अस्पताल के भ्रष्ट डॉक्टरों, स्टोर प्रभारियों और निजी दवा डीलरों की मिलीभगत से चल रहे इस काले खेल की फाइल जैसे ही शासन की मेज पर पहुंची है, केजीएमयू के प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मच गया है। सूत्रों की मानें तो रिपोर्ट में कई बड़े चेहरों की संलिप्तता के पुख्ता सबूत मिले हैं, जिसके बाद दोषी डॉक्टरों, अधिकारियों और कर्मचारियों पर बड़ी प्रशासनिक व कानूनी गाज गिरना बिल्कुल तय माना जा रहा है।
डिप्टी सीएम कार्यालय का सख्त रुख: 6 जून को जारी हुआ था अल्टीमेटम पत्र, कहा- ‘सरकार की छवि खराब हो रही’
इस पूरे मामले का संज्ञान खुद सूबे के उपमुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री ब्रजेश पाठक के कार्यालय ने बेहद गंभीरता से लिया था। उपमुख्यमंत्री कार्यालय ने चिकित्सा शिक्षा विभाग को एक बेहद कड़ा पत्र भेजकर केजीएमयू में दवाओं से जुड़े भ्रष्टाचार और मरीजों के साथ हो रहे खिलवाड़ की उच्चस्तरीय जांच कराने के सीधे निर्देश दिए थे। डिप्टी सीएम कार्यालय से 6 जून 2026 को जारी किए गए इस आधिकारिक पत्र में साफ शब्दों में लिखा गया था कि पिछले कई महीनों से केजीएमयू जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में भ्रष्टाचार, कदाचार और गरीब मरीजों के साथ दुर्व्यवहार की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं, जो बेहद चिंताजनक हैं। इन गंभीर मामलों को समाचार पत्रों और मुख्यधारा के न्यूज चैनलों में भी प्रमुखता से उजागर किया गया था।
डिप्टी सीएम कार्यालय के पत्र में इस बात पर गहरा असंतोष व्यक्त किया गया था कि शिकायतों की कई बार आंतरिक जांच कराए जाने के बावजूद कोई ठोस परिणाम नहीं निकल पाया और केजीएमयू का पूरा सिस्टम जस का तस भ्रष्ट बना रहा। पत्र में साफ तौर पर लिखा गया कि केजीएमयू की अव्यवस्थाओं को दूर करने के लिए पूर्व में कई प्रयास किए गए, लेकिन धरातल पर न तो व्यवस्थाओं में कोई सुधार हो सका और न ही गरीब मरीजों की समस्याओं का कोई स्थायी समाधान निकला। हाल के दिनों में कैंसर और यूरोलॉजी की दवाओं को लेकर अधिकारियों और कर्मचारियों पर लगे घपलेबाजी के आरोपों से सरकार की बेदाग छवि भी प्रभावित हो रही है। इसी के तहत जांच समिति को महज दो कार्य दिवस के भीतर अपनी विस्तृत रिपोर्ट उपलब्ध कराने का कड़ा अल्टीमेटम दिया गया था।

यूरोलॉजी और नेत्र रोग विभाग में हुआ था सबसे बड़ा ‘खेल’: असाध्य योजना के 2.5 करोड़ रुपये डकारे
जांच के दौरान केजीएमयू के जिन दो विभागों की सबसे काली करतूतें सामने आई हैं, उनमें यूरोलॉजी विभाग और नेत्र रोग विभाग शीर्ष पर हैं। सबसे बड़ा और शर्मनाक खेल यूरोलॉजी विभाग में गरीब मरीजों के इलाज के लिए आने वाली सरकारी ‘असाध्य योजना’ के बजट में किया गया। इस योजना में सेंधमारी कर करीब 2.5 करोड़ (ढाई करोड़) रुपये की दवाओं का सीधा घपला किया गया। पूरी दवा खरीद प्रक्रिया और इसमें शामिल कई वरिष्ठ डॉक्टरों की भूमिका अब सीधे तौर पर जांच के घेरे में आ गई है। चौंकाने वाली बात यह है कि जांच में कई ऐसे फर्जी मरीजों के नाम सामने आए हैं, जिनके नाम पर कागजों में कैंसर की बेहद कीमती और महंगी दवाएं जारी कराकर बाजार में बेच दी गईं।
वहीं दूसरी तरफ, नेत्र रोग विभाग (Ophthalmology) की जांच में यह खौफनाक सच सामने आया कि मोतियाबिंद और आंखों के ऑपरेशन के लिए आने वाले बेबस मरीजों को केजीएमयू की मुफ्त या रियायती व्यवस्था का लाभ देने के बजाय, वहां के कुछ डॉक्टरों द्वारा जानबूझकर बाहर की खास निजी दुकानों से महंगे लैंस और दवाएं खरीदने के लिए मजबूर किया जाता था। जांच टीम ने इन गंभीर आरोपों की पड़ताल के लिए संबंधित वार्डों के रिकॉर्ड, डॉक्टरों के प्रिस्क्रिप्शन, ऑपरेशन थियेटर से जुड़े दस्तावेज और विभागीय स्टॉक रजिस्टर की गहनता से समीक्षा की है, जिसमें गड़बड़ी के कई पुख्ता सबूत हाथ लगे हैं।
अमित कुमार घोष के निर्देश पर बनी थी 3 सदस्यीय हाई-प्रोफाइल कमेटी, सचिव और महानिदेशक ने की पड़ताल
डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक के कड़े तेवरों के बाद चिकित्सा शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव अमित कुमार घोष ने खुद कमान संभाली और केजीएमयू प्रशासन से दोनों घोटालों पर फौरन जवाब तलब किया। इसके बाद शासन स्तर पर मामले की बारीक पड़ताल के लिए एक बेहद हाई-प्रोफाइल 3 सदस्यीय विशेष कमेटी का गठन किया गया था। इस कमेटी की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें खुद चिकित्सा शिक्षा विभाग के सचिव, महानिदेशक चिकित्सा शिक्षा (DGME) सारिका मोहन और चिकित्सा शिक्षा विभाग के विशेष सचिव रवि रंजन को सदस्य बनाया गया था।
इस तीन सदस्यीय उच्चस्तरीय कमेटी ने केजीएमयू के दवा वितरण केंद्रों, स्टोर रूम और दोनों प्रभावित विभागों के कर्मचारियों से आमने-सामने पूछताछ कर उनके बयान दर्ज किए। साथ ही, पिछले तीन वर्षों के दवा खरीद और वितरण से जुड़े सभी महत्वपूर्ण डिजिटल और मैनुअल दस्तावेजों का फोरेंसिक व प्रशासनिक परीक्षण कर यह अंतिम रिपोर्ट तैयार की है। शासन ने अपनी इस जांच में विशेष रूप से यह जानने का प्रयास किया है कि केजीएमयू के किन-किन डॉक्टरों और अधिकारियों ने वित्तीय नियमों और मेडिकल एथिक्स का खुला उल्लंघन किया और इस ढाई करोड़ के घोटाले का असली मास्टरमाइंड कौन है।
केजीएमयू के डॉक्टरों में मची खलबली, अब सीधे मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री के स्तर से होगा फैसला
दोनों बड़े प्रकरणों में उत्तर प्रदेश शासन की इस अभूतपूर्व सक्रियता और कड़े रुख के बाद केजीएमयू के सभी संबंधित विभागों और प्रशासनिक अमले में भारी सतर्कता और डर का माहौल देखा जा रहा है। जिन विभागों में कल तक फाइलों को दबाने का खेल चल रहा था, वहां अब क्लर्क और डॉक्टर सहमे हुए नजर आ रहे हैं। अब इन दोनों संवेदनशील मामलों में शासन स्तर से केजीएमयू द्वारा भेजी गई 3 पेज की रिपोर्ट का बारीकी से परीक्षण किया जाएगा।
इसके बाद, दोषी पाए जाने वाले शीर्ष डॉक्टरों, स्टोर प्रभारियों या ठेकेदारों के खिलाफ सीधे निलंबन (Suspension), विभागीय चार्जशीट और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत एफआईआर दर्ज कराकर जेल भेजने का फैसला लिया जा सकता है। सचिवालय के सूत्रों का कहना है कि सरकार इस मामले में जीरो टॉलरेंस की नीति के तहत एक नजीर पेश करने की तैयारी में है, ताकि प्रदेश के सबसे बड़े मेडिकल संस्थान में दोबारा कोई गरीबों की दवाओं पर डाका डालने की जुर्रत न कर सके।




