राज्य सरकार जहाँ एक ओर पारदर्शी और ‘भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन’ का दावा करते हुए जनसेवा को प्राथमिकता दे रही है, वहीं मैदानी स्तर पर कुछ विभागीय विसंगतियां इन दावों को चुनौती दे रही हैं। प्रदेश के एक क्षेत्रीय थाने से आ रही शिकायतों के मुताबिक, वर्तमान में आम नागरिकों को अपने बुनियादी सरकारी कामों के लिए भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। स्थानीय स्तर पर चरित्र सत्यापन (Police Verification) और जमानत संबंधी प्रक्रियाओं के नाम पर कथित रूप से एक अनौपचारिक “रेट कार्ड” संचालित किए जाने का गंभीर मामला सामने आया है।
फाइलों को अटकाने और मानसिक प्रताड़ना का आरोप
विभागीय सूत्रों और स्थानीय शिकायतों के अनुसार, थाने में तैनात कुछ अराजक तत्वों और बिचौलियों के सिंडिकेट ने एक ऐसा समानांतर तंत्र बना रखा है, जो सीधे तौर पर आम आवेदकों और वैधानिक कार्य कराने आने वाले लोगों को निशाना बनाता है।
- अवैध मांग: जानकारी के मुताबिक, चरित्र सत्यापन जैसी सामान्य शासकीय फाइलों को आगे बढ़ाने के लिए एक निश्चित धनराशि की मांग की जाती है।
- लटकाए जाते हैं मामले: जो लोग इस अनुचित प्रक्रिया का विरोध करते हैं, उनका सत्यापन कई हफ्तों तक जानबूझकर लटका दिया जाता है। आवेदकों को बार-बार दफ्तरों के चक्कर लगवाकर मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है।
- तत्काल क्लीयरेंस: इसके विपरीत, कथित तौर पर जो फाइलें लंबे समय से धूल फांक रही होती हैं, वे अनुचित साठगांठ के बाद कुछ ही घंटों में “क्लियर” कर दी जाती हैं।
सुरक्षा और व्यवस्था के साथ खिलवाड़ का अंदेशा
यह पूरा मामला केवल प्रशासनिक शिथिलता का नहीं, बल्कि सामाजिक सुरक्षा और व्यवस्था से भी जुड़ा हुआ है। जानकारों का कहना है कि यदि सत्यापन प्रक्रियाओं में पारदर्शिता नहीं रहेगी और नियमों को ताक पर रखकर मुहर लगाई जाएगी, तो शातिर अपराधियों के भी बच निकलने की आशंका बढ़ जाती है। यदि किसी व्यक्ति का आपराधिक इतिहास उचित जांच के बिना छुपाया जाता है, तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं, जिसके लिए सीधे तौर पर संबंधित कर्मचारी जवाबदेह होंगे।
प्रशासनिक शिथिलता और उच्चाधिकारियों के सामने चुनौती
इतने संवेदनशील मामलों में स्थानीय प्रभारियों की कथित चुप्पी और शिथिलता कई तरह के संदेह पैदा करती है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या जिम्मेदार अधिकारियों को अपने मातहतों की इन गतिविधियों की भनक नहीं है, या फिर इस पूरे मामले को जानबूझकर नजरअंदाज किया जा रहा है? इस अव्यवस्था से थाने के भीतर का आंतरिक अनुशासन पूरी तरह प्रभावित दिख रहा है।
अब यह जिला पुलिस कप्तान और अनुशासित उच्चाधिकारियों के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है कि वे इस आंतरिक तंत्र को कैसे दुरुस्त करते हैं। जागरूक नागरिकों द्वारा मांग की जा रही है कि:
- दोषी और भ्रष्ट आचरण वाले कर्मियों को चिन्हित कर तत्काल निलंबित किया जाए।
- थाना प्रभारियों की जवाबदेही तय की जाए ताकि वे अपने अधीनस्थ कर्मचारियों पर नियंत्रण रख सकें।
- पारदर्शी जांच कराकर उन सभी पीड़ितों को न्याय दिलाया जाए जिन्हें इस लचर व्यवस्था का शिकार होना पड़ा है।
जनता अब इस पूरे प्रकरण की विभागीय जांच कराकर दोषियों के खिलाफ सख्त दंडात्मक कार्रवाई की उम्मीद कर रही है।




